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शिक्षा इतनी महंगी क्यों? निजी स्कूलों को ज्यादा मंजूरी मिलने से बढ़ी असमानता

सरकारी स्कूलों की स्थिति कमजोर होने और अंग्रेजी माध्यम के बढ़ते आकर्षण के बीच अभिभावकों पर बढ़ रहा आर्थिक बोझ
user2 June 8, 2026
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देश के तेजी से विकसित हो रहे महानगरों में शामिल है, लेकिन इसी विकास के साथ शहर में शिक्षा का खर्च भी लगातार बढ़ता जा रहा है। पिछले कुछ वर्षों में निजी स्कूलों की संख्या में उल्लेखनीय वृद्धि हुई है, जबकि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों की संख्या अपेक्षाकृत कम होती दिखाई दे रही है। इसका सीधा असर शहर के मध्यम और निम्न मध्यम वर्गीय परिवारों की आर्थिक स्थिति पर पड़ रहा है।

शहर में CBSE, ICSE और इंटरनेशनल बोर्ड से जुड़े स्कूलों की संख्या लगातार बढ़ रही है। शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का मानना है कि अंग्रेजी माध्यम शिक्षा और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर की मांग ने निजी स्कूल उद्योग को तेजी से विस्तार दिया है। कई नए रिहायशी इलाकों और टाउनशिप में स्कूलों का विकास रियल एस्टेट प्रोजेक्ट्स का हिस्सा बन चुका है।

पिछले पांच वर्षों में क्या बदला?

पिछले कुछ वर्षों में देशभर में निजी स्कूलों की संख्या तेजी से बढ़ी है। कई राज्यों में नए निजी स्कूलों को मंजूरी देने की प्रक्रिया भी आसान बनाई गई है। शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि सरकारी स्कूलों में संसाधनों और गुणवत्ता की कमी के कारण अभिभावक निजी स्कूलों की ओर रुख कर रहे हैं। इसका सीधा फायदा निजी शिक्षण संस्थानों को मिल रहा है।

निजी स्कूलों में अंग्रेजी माध्यम का चलन भी तेजी से बढ़ा है। अधिकांश अभिभावकों का मानना है कि अंग्रेजी भाषा भविष्य में रोजगार और करियर के बेहतर अवसर प्रदान करती है। इसी सोच के कारण वे बच्चों को अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में भेजना पसंद करते हैं, भले ही इसके लिए उन्हें अधिक फीस चुकानी पड़े।

दूसरी ओर, सरकारी स्कूलों में हिंदी और क्षेत्रीय भाषाओं में शिक्षा उपलब्ध होने के बावजूद कई परिवार वहां बच्चों को भेजने से बचते हैं। इसके पीछे शिक्षा की गुणवत्ता, आधुनिक सुविधाओं की कमी और सामाजिक धारणा जैसे कई कारण बताए जाते हैं।

शिक्षा क्षेत्र से जुड़े जानकारों का कहना है कि यदि सरकारी स्कूलों में बेहतर आधारभूत सुविधाएं, प्रशिक्षित शिक्षक और आधुनिक शिक्षा व्यवस्था उपलब्ध कराई जाए तो बड़ी संख्या में अभिभावक निजी स्कूलों पर निर्भर नहीं रहेंगे। इससे शिक्षा का खर्च भी कम होगा और सभी वर्गों के बच्चों को समान अवसर मिल सकेंगे।

फीस कितनी बढ़ी?

शहर के कई प्रतिष्ठित CBSE और ICSE स्कूलों में प्राथमिक स्तर की वार्षिक फीस अब 60 हजार से 1.5 लाख रुपए तक पहुंच चुकी है। वहीं इंटरनेशनल स्कूलों में यह फीस 2 लाख से 6 लाख रुपए या उससे अधिक तक जा रही है।

इसके अलावा ट्रांसपोर्ट, यूनिफॉर्म, डिजिटल लर्निंग चार्ज, एक्टिविटी फीस और किताबों का खर्च अलग से जुड़ता है। कई अभिभावकों का कहना है कि स्कूल फीस के अलावा सहायक खर्चों ने शिक्षा को और अधिक महंगा बना दिया है।

मध्यमवर्गीय परिवार कितना खर्च कर रहा?

शहर के मध्यमवर्गीय परिवारों के लिए एक बच्चे की शिक्षा पर सालाना खर्च अब एक से दो लाख रुपए तक पहुंच रहा है। यदि परिवार के दो बच्चे हों तो शिक्षा पर होने वाला कुल वार्षिक खर्च कई बार परिवार की कुल आय का 20 से 30 प्रतिशत तक पहुंच जाता है।

अभिभावकों का कहना है कि बच्चों को बेहतर अवसर देने की चाहत में वे अपनी बचत, निवेश और अन्य खर्चों में कटौती करने को मजबूर हैं।

सरकारी स्कूलों से निजी स्कूलों की ओर रुझान

 पिछले कुछ वर्षों के दौरान बड़ी संख्या में परिवारों ने सरकारी स्कूलों की बजाय निजी स्कूलों को प्राथमिकता दी है। इसका प्रमुख कारण अंग्रेजी माध्यम शिक्षा, तकनीकी सुविधाएं और निजी स्कूलों की ब्रांड वैल्यू मानी जा रही है।

हालांकि सरकारी स्कूलों में निशुल्क शिक्षा, मिड-डे मील और विभिन्न सरकारी योजनाएं उपलब्ध हैं, फिर भी कई परिवार निजी संस्थानों को बेहतर विकल्प मानते हैं।

अंग्रेजी माध्यम सरकारी स्कूलों का असर

सरकार द्वारा शुरू किए गए अंग्रेजी माध्यम सरकारी स्कूलों ने इस धारणा को कुछ हद तक चुनौती दी है। कई सरकारी अंग्रेजी माध्यम स्कूलों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन स्कूलों में गुणवत्तापूर्ण शिक्षण, आधुनिक सुविधाएं और प्रशिक्षित शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित की जाए तो निजी स्कूलों पर निर्भरता कम हो सकती है।

शिक्षा या उद्योग?

विशेषज्ञों का मानना है कि शिक्षा क्षेत्र में बढ़ता निजी निवेश एक ओर बेहतर सुविधाएं लेकर आया है, लेकिन दूसरी ओर शिक्षा को एक बड़े आर्थिक क्षेत्र में भी बदल दिया है। अहमदाबाद जैसे शहरों में स्कूल अब केवल शिक्षण संस्थान नहीं बल्कि एक संगठित सेवा उद्योग के रूप में विकसित हो रहे हैं।

यही कारण है कि शिक्षा की बढ़ती लागत और अवसरों की असमानता पर बहस लगातार तेज होती जा रही है।

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