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जेट फ्यूल महंगा, जल्द बढ़ सकते हैं घरेलू फ्लाइट टिकटों के दाम

एटीएफ की कीमतों में करीब 10 फीसदी बढ़ोतरी और नई प्राइस स्टेबलाइजेशन स्कीम के बाद घरेलू उड़ानों के किराए पर असर पड़ने की आशंका बढ़ी।
user2 June 10, 2026
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पेट्रोल और एलपीजी सिलेंडर की कीमतों में बढ़ोतरी के बाद अब हवाई यात्रा भी आम लोगों के लिए महंगी हो सकती है। सरकार द्वारा घरेलू एयरलाइंस के लिए नई प्राइस स्टेबलाइजेशन स्कीम लागू किए जाने और एविएशन टर्बाइन फ्यूल (ATF) की कीमतों में करीब 10 प्रतिशत की वृद्धि के बाद फ्लाइट टिकटों के दाम बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।

नई व्यवस्था के तहत घरेलू एयरलाइंस को तीन साल तक के लिए जेट फ्यूल की कीमतें तय करने का विकल्प दिया गया है। इस स्कीम में शामिल होने वाली एयरलाइंस को एटीएफ के लिए 115 रुपये प्रति लीटर की निर्धारित कीमत चुकानी होगी। इससे पहले यह कीमत 104.927 रुपये प्रति लीटर थी। यानी नई दरों के अनुसार एयरलाइंस के ईंधन खर्च में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।

सरकार की ओर से शुरू की गई यह योजना पूरी तरह स्वैच्छिक है। एयरलाइंस अपने व्यावसायिक हितों को देखते हुए तय कर सकेंगी कि उन्हें इस योजना में शामिल होना है या नहीं। जो एयरलाइंस इस स्कीम का हिस्सा बनेंगी, उन्हें तीन वर्षों तक अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल और जेट फ्यूल की कीमतों में होने वाले उतार-चढ़ाव से सुरक्षा मिलेगी। हालांकि इसके बदले उन्हें तय दर पर ईंधन खरीदना होगा।

दूसरी ओर, जो एयरलाइंस इस फ्रेमवर्क से बाहर रहने का निर्णय लेंगी, वे बाजार आधारित कीमतों पर ही एटीएफ खरीदती रहेंगी। वर्तमान में यह दर लगभग 142 रुपये प्रति लीटर है, जो अंतरराष्ट्रीय एयरलाइंस द्वारा चुकाई जा रही कीमतों के बराबर है। ऐसे में बाजार मूल्य पर ईंधन खरीदने वाली एयरलाइंस को कीमतें घटने पर फायदा मिल सकता है, लेकिन कीमतें बढ़ने की स्थिति में अतिरिक्त बोझ भी उन्हें ही उठाना पड़ेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि विमानन क्षेत्र में ईंधन लागत किसी भी एयरलाइन के कुल परिचालन खर्च का 35 से 45 प्रतिशत तक हिस्सा होती है। इसलिए एटीएफ की कीमतों में होने वाली बढ़ोतरी का सीधा असर एयरलाइंस की लागत पर पड़ता है। यदि ईंधन महंगा होता है तो एयरलाइंस अक्सर इस अतिरिक्त खर्च का कुछ हिस्सा यात्रियों पर डालती हैं, जिससे टिकटों के दाम बढ़ जाते हैं।

सरकार द्वारा तय किया गया नया फिक्स्ड प्राइसिंग फॉर्मूला 86.32 रुपये प्रति लीटर के ‘फ्री-ऑन-बोर्ड’ (FOB) बेंचमार्क पर आधारित है। इसमें एयरपोर्ट चार्ज, ऑयल मार्केटिंग कंपनियों का मार्जिन और विभिन्न प्रकार के कर शामिल हैं। इस व्यवस्था के अनुसार दिल्ली में एटीएफ की प्रभावी कीमत 115 रुपये प्रति लीटर, मुंबई में 114.5 रुपये प्रति लीटर और चेन्नई में लगभग 139 रुपये प्रति लीटर होगी।

यह फैसला ऐसे समय में लिया गया है जब पश्चिम एशिया में जारी भू-राजनीतिक तनाव के कारण वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल और जेट फ्यूल की कीमतों में लगातार बढ़ोतरी देखी जा रही है। इसके बावजूद भारत में पिछले दो महीनों से अधिक समय तक घरेलू एटीएफ की कीमतें लगभग 105 रुपये प्रति लीटर पर स्थिर बनी हुई थीं। बताया जा रहा है कि अंतरराष्ट्रीय कीमतों में बढ़ोतरी का पूरा बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डालने के कारण सरकारी तेल विपणन कंपनियों को नुकसान उठाना पड़ा।

इन नुकसानों की भरपाई करने और विमानन क्षेत्र को भविष्य में होने वाली मूल्य अस्थिरता से बचाने के लिए केंद्र सरकार ने 10,000 करोड़ रुपये के प्राइस स्टेबलाइजेशन फ्रेमवर्क को मंजूरी दी है। इस व्यवस्था के तहत यदि अंतरराष्ट्रीय बाजार में जेट फ्यूल की कीमतें निर्धारित बेस रेट 86.32 रुपये प्रति लीटर से ऊपर जाती हैं तो सरकार तेल कंपनियों को बिना ब्याज के अग्रिम राशि उपलब्ध कराएगी।

वहीं जब वैश्विक कीमतों में गिरावट आएगी तो अतिरिक्त राशि की वसूली कर उसे भारत के समेकित कोष (Consolidated Fund of India) में वापस जमा कराया जाएगा। सरकार का मानना है कि इससे तेल कंपनियों को वित्तीय स्थिरता मिलेगी और एयरलाइंस को भी भविष्य की कीमतों का बेहतर अनुमान लगाने में मदद मिलेगी।

विमानन विशेषज्ञों का कहना है कि नई स्कीम से एयरलाइंस को दीर्घकालिक योजना बनाने में सुविधा मिलेगी, लेकिन एटीएफ की मौजूदा बढ़ी हुई कीमतें निकट भविष्य में यात्रियों के लिए हवाई यात्रा महंगी कर सकती हैं। विशेष रूप से त्योहारों और छुट्टियों के सीजन में टिकटों की मांग बढ़ने के साथ किराए में अतिरिक्त बढ़ोतरी देखने को मिल सकती है।

हालांकि अंतिम निर्णय एयरलाइंस पर निर्भर करेगा कि वे बढ़ी हुई लागत का कितना हिस्सा स्वयं वहन करती हैं और कितना यात्रियों पर डालती हैं। फिलहाल एविएशन सेक्टर और यात्रियों की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि आने वाले दिनों में एयरलाइंस अपने किराए में कितना बदलाव करती हैं।

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