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मदर डेयरी ने लॉन्च किया भारत का पहला बायोडिग्रेडेबल दूध पाउच

मदर डेयरी ने लॉन्च किया भारत का पहला बायोडिग्रेडेबल दूध पाउच
user2 June 2, 2026
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देश में तेजी से बढ़ रहे प्लास्टिक कचरे और उससे पैदा हो रही पर्यावरणीय चुनौतियों के बीच मदर डेयरी ने एक महत्वपूर्ण और अभिनव पहल की है। कंपनी ने भारत का पहला बायोडिग्रेडेबल दूध पाउच लॉन्च किया है, जो उपयोग के बाद प्राकृतिक रूप से मिट्टी में मिल जाएगा। इस नई तकनीक को डेयरी उद्योग में एक बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है और इसे प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया जा रहा है।

मदर डेयरी ने मंगलवार को आयोजित एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में इस नई पैकेजिंग तकनीक का अनावरण किया। कंपनी के अनुसार, यह विशेष दूध पाउच पर्यावरण के अनुकूल है और इस्तेमाल के बाद धीरे-धीरे प्राकृतिक रूप से नष्ट होकर मिट्टी में समा जाएगा। इस पहल की शुरुआत 5 जून, विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर दिल्ली-एनसीआर क्षेत्र से की जाएगी।

प्लास्टिक प्रदूषण से निपटने की दिशा में बड़ा कदम

भारत सहित दुनिया भर में प्लास्टिक कचरा एक गंभीर समस्या बन चुका है। रोजमर्रा के जीवन में उपयोग होने वाले प्लास्टिक उत्पादों का बड़ा हिस्सा वर्षों तक नष्ट नहीं होता, जिससे भूमि, जल स्रोतों और पर्यावरण को भारी नुकसान पहुंचता है। दूध के पैकेट भी प्लास्टिक कचरे का एक बड़ा स्रोत माने जाते हैं।

ऐसे में मदर डेयरी की यह पहल केवल एक नई पैकेजिंग तकनीक नहीं, बल्कि पर्यावरण संरक्षण की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास के रूप में देखी जा रही है। कंपनी का मानना है कि यदि यह मॉडल सफल होता है तो आने वाले वर्षों में डेयरी उद्योग में पैकेजिंग का स्वरूप बदल सकता है।

गाय के दूध से होगी शुरुआत

मदर डेयरी ने बताया कि शुरुआती चरण में कंपनी अपने गाय के दूध को इसी नए बायोडिग्रेडेबल पाउच में बाजार में उतारेगी। इसके बाद चरणबद्ध तरीके से अन्य उत्पादों में भी इस तकनीक को शामिल करने पर विचार किया जाएगा।

गौरतलब है कि मदर डेयरी देश की प्रमुख डेयरी कंपनियों में से एक है और कई राज्यों में प्रतिदिन लगभग 55 लाख लीटर दूध की बिक्री करती है। ऐसे में इस नई पैकेजिंग का प्रभाव बड़े स्तर पर देखने को मिल सकता है।

चार वर्षों की रिसर्च का परिणाम

मदर डेयरी के प्रबंध निदेशक जयतीर्थ चारी ने बताया कि इस विशेष पाउच को विकसित करने में चार वर्ष से अधिक समय लगा है।

उन्होंने कहा कि कंपनी का उद्देश्य ऐसी पैकेजिंग विकसित करना था जो उपभोक्ताओं की जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ पर्यावरण पर पड़ने वाले नकारात्मक प्रभाव को भी कम करे।

उनके अनुसार, इस तकनीक के विकास के दौरान यह सुनिश्चित किया गया कि पैकेजिंग मजबूत, सुरक्षित और डेयरी उत्पादों के लिए उपयुक्त हो, जबकि उपयोग के बाद उसका पर्यावरणीय प्रभाव न्यूनतम रहे।

कैसे काम करता है यह बायोडिग्रेडेबल पाउच?

कंपनी के मुताबिक, इस नई पैकेजिंग में विशेष प्रकार की तकनीक का उपयोग किया गया है। उपयोग के बाद यह पाउच धीरे-धीरे प्राकृतिक मोम (Natural Wax) में परिवर्तित होने लगता है।

इसके बाद मिट्टी में मौजूद सूक्ष्म जीव (Microorganisms) इस मोम को प्राकृतिक तत्वों में बदल देते हैं। पूरी प्रक्रिया के बाद कोई हानिकारक प्लास्टिक अवशेष नहीं बचता।

यानी यह पाउच न केवल रीसाइक्लिंग के लिए उपयुक्त रहेगा बल्कि यदि किसी कारणवश यह कचरे के रूप में पर्यावरण में पहुंच भी जाए तो समय के साथ प्राकृतिक रूप से समाप्त हो जाएगा।

रीसाइक्लिंग और बायोडिग्रेडेशन दोनों की सुविधा

मदर डेयरी का दावा है कि नया पाउच केवल बायोडिग्रेडेबल ही नहीं बल्कि रीसाइक्लेबल भी है।

इसका मतलब यह है कि यदि उपभोक्ता इसे रीसाइक्लिंग चैनल में भेजते हैं तो इसका पुनः उपयोग संभव होगा। वहीं यदि यह सामान्य परिस्थितियों में पर्यावरण में पहुंचता है तो भी यह लंबे समय तक प्लास्टिक कचरे के रूप में मौजूद नहीं रहेगा।

विशेषज्ञों का मानना है कि इस तरह की दोहरी व्यवस्था भविष्य की टिकाऊ पैकेजिंग प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण साबित हो सकती है।

उपभोक्ताओं पर नहीं पड़ेगा अतिरिक्त आर्थिक बोझ

नई तकनीक आने पर अक्सर यह आशंका रहती है कि उत्पादों की कीमतों में वृद्धि हो सकती है। हालांकि मदर डेयरी और राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) ने स्पष्ट किया है कि इस नई पैकेजिंग का अतिरिक्त बोझ उपभोक्ताओं पर नहीं डाला जाएगा।

मीनेश शाह, जो राष्ट्रीय डेयरी विकास बोर्ड (NDDB) के चेयरमैन हैं, ने कहा कि यह नया पाउच कुछ वर्षों में पूरी तरह प्राकृतिक रूप से नष्ट हो जाएगा।

उन्होंने स्पष्ट किया कि इस पहल के कारण दूध की कीमतों में कोई बढ़ोतरी नहीं की जाएगी। उनका कहना है कि पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास को बढ़ावा देने के लिए ऐसी तकनीकों को प्रोत्साहित किया जाना चाहिए।

डेयरी सेक्टर के लिए नई मिसाल

विशेषज्ञों का मानना है कि मदर डेयरी की यह पहल पूरे डेयरी उद्योग के लिए एक उदाहरण बन सकती है।

भारत दुनिया के सबसे बड़े दुग्ध उत्पादक देशों में शामिल है और करोड़ों दूध पाउच प्रतिदिन उपयोग में लाए जाते हैं। यदि बड़ी संख्या में डेयरी कंपनियां इसी प्रकार की पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग अपनाती हैं तो प्लास्टिक कचरे में उल्लेखनीय कमी लाई जा सकती है।

पर्यावरणविदों का कहना है कि केवल सरकारों के प्रयासों से ही नहीं बल्कि उद्योगों और उपभोक्ताओं की भागीदारी से भी प्लास्टिक प्रदूषण की समस्या को कम किया जा सकता है।

विश्व पर्यावरण दिवस पर खास शुरुआत

इस नई पहल की शुरुआत 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस के अवसर पर की जा रही है, जिससे इसका प्रतीकात्मक महत्व भी बढ़ जाता है।

हर वर्ष विश्व पर्यावरण दिवस पर पर्यावरण संरक्षण और टिकाऊ विकास से जुड़े संदेश दिए जाते हैं। ऐसे में मदर डेयरी का यह कदम उद्योग जगत की ओर से पर्यावरण संरक्षण के लिए एक सकारात्मक संदेश माना जा रहा है।

पर्यावरण संरक्षण की दिशा में नई उम्मीद

बढ़ते प्लास्टिक प्रदूषण के बीच बायोडिग्रेडेबल पैकेजिंग को भविष्य का समाधान माना जा रहा है। हालांकि इस तकनीक की सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि इसे कितने बड़े स्तर पर अपनाया जाता है और उपभोक्ता इसे किस प्रकार स्वीकार करते हैं।

फिलहाल मदर डेयरी की यह पहल देश में टिकाऊ और पर्यावरण-अनुकूल पैकेजिंग की दिशा में एक महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखी जा रही है। यदि यह प्रयोग सफल रहता है तो आने वाले समय में अन्य खाद्य और डेयरी कंपनियां भी इसी प्रकार की तकनीक अपनाने की दिशा में कदम बढ़ा सकती हैं।

पर्यावरण संरक्षण, प्लास्टिक कचरे में कमी और टिकाऊ विकास की दिशा में यह कदम भारत के डेयरी उद्योग के लिए एक नई शुरुआत साबित हो सकता है।

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